आज का वचन

जागरूकता में रहें, लेकिन इसे पकड़कर न रखें

2026 . 01 . 22

गहन अभ्यास में सीखी गई जागरूकता केवल अभ्यास-कक्ष में ही नहीं रहनी चाहिए। आती-जाती साँस को न चूकना और शरीर की संवेदनाओं को उठते-मिटते देखना मन को जगाने का अच्छा प्रशिक्षण है।

फिर भी यदि हम केवल जागरूकता को पकड़कर रखें, तो वह एक और आसक्ति बन जाती है। साधक का मार्ग है जागरूक रहना, पर उस जागरूकता से बँधना नहीं, और उस प्रज्ञा को दैनिक जीवन की वाणी और कर्म में ठीक से उपयोग करना।

हम हर बाहरी उत्तेजना से बचकर नहीं जी सकते। इसलिए उत्तेजना आते ही तुरंत प्रतिक्रिया देना महत्वपूर्ण नहीं है; महत्वपूर्ण है शरीर और मन के बदलावों को देखना और समता को पुनः पाना।

आज उठती संवेदनाओं और मनःस्थितियों को न खोएँ, और उनसे चिपके बिना प्रज्ञा के साथ दिन जिएँ।

जागरूकता कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिससे चिपके रहें; यह समझदारी से जीने की ताकत है।

यदि हम जागरूकता को ही पकड़ लें, तो वह एक और आसक्ति बन जाती है। साधक का मार्ग जागरूक रहना है, पर उससे बँधना नहीं, और उस प्रज्ञा को दैनिक वाणी और कर्म में सही ढंग से उपयोग करना है। हर बाहरी उत्तेजना से बचना संभव नहीं; महत्वपूर्ण है शरीर और मन के बदलावों को देखना और तुरंत प्रतिक्रिया के बजाय समता लौटाना।

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जागरूकता में रहें, लेकिन रुके न रहें
जागरूकता में रहें, लेकिन इसे पकड़कर न रखें कार्टून
एक मन अभ्यास कक्ष से निकलता है और एक व्यस्त सड़क से मिलता है।
सांसें और संवेदनाएं छोटे-छोटे दीपकों की तरह टिमटिमाती हैं।
आचार्य कहते हैं, दीपक से मार्ग रोशन होने दें।
उत्तेजना आए तो पहले एक साँस रुकें।
दीपक पूरे दिन चुपचाप जलता रहता है।